जलवायु परिवर्तन में बदलाव की भारत की नेट जीरो प्रतिबद्धता

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तौफीक़ हयात

जयपुर। जलवायु परिवर्तन का खतरा वास्तविक है और इसका भविष्य ओर भी भयावह। इसका संकेत हम कई तरह से देख चुके है। कही बेमौसम बरसात तो कही जंगलो में लगी आग। बढ़ता तापमान इत्यादि।

हाल ही में बीते शनिवार से तमिलनाडु राज्य की राजधानी चेन्नई में बरसात जारी है जो सोमवार तक रही। इससे चेन्नई का मरीना बीच जलमग्न हो गया इससे चार लोगों की मौत भी हो गई। प्रदेश में 12 नवम्बर तक मौसम विभाग ने अलर्ट भी जारी कर दिया जिससे राज्य के इक्कीस जिलों के स्कूल बंद कर दिए गए।

इन सब परिस्थितियों का कारण हम जलवायु परिवर्तन से भी समझ सकते है कि बेमौसम बारिश इतनी भयावह क्यो है।

संयुक्त राष्ट्र की इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेंट चेंज (आईपीसीसी) की रिपोर्ट का यह संदेश हमारे आस पास हो रहे बदलावों की पुष्टि करता है।

रिपोर्ट के कुछ पहलू काफी महत्वपूर्ण है पहला यह कि 2040 तक पृथ्वी के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती हैं। 1880 के दशक से 1.09  डिग्री सेल्सियस वृद्धि के फलस्वरूप बड़े पैमाने पर तबाही हो रही है।

आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन बढ़ेगा क्योंकि कोविड 19 महामारी से चपेट में आई अर्थव्यवस्था को वापस सामान्य में लाने के लिए हर देश दोगुनी मेहनत से रिकवरी करेगा।

रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और चीन एक साथ मिलकर दुनिया के वार्षिक उत्सर्जन करते है। यदि 1870 से 2019 तक उत्सर्जन को जोड़ दे तो अमेरिका, यूरोपीय संघ 27 रूस, ब्रिटेन, जापान और चीन के वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड बजट में 60 प्रतिशत का योगदान करते है। आईपीसीसी के अनुसार चीन आने वाले दशक में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में अपने हिस्से के 10 गीगाटन से 12 गीगा टन तक बढ़ा देगा।

तकनीकी रूप से दुनिया में भारत कार्बन डाइऑक्साइड में तीसरा सबसे बड़ा वार्षिक प्रदूषक है जो इस योगदान में महत्वहीन है। जहाँ अमेरिका कार्बन डाइऑक्साइड 5 जीटी उत्सर्जित करता है वहीं भारत 10 जीटी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करता है। 1870 से 2019 के बीच वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड में भारत की 3 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से स्कोटलेंड के ग्लासगो में 2070 तक भारत को नेट जीरो उत्सर्जक देश बनाने की घोषणा की गई है। वही आईपीसीसी के अनुसार हमें 2030 तक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को 2010 के स्तर से 45 से 50 प्रतिशत कम करने और 2050 तक नेट जीरो तक पहुंचने की आवश्यकता हैं। इसके साथ ही उन्होंने पँचसूत्रीय कार्यक्रम “पन्चामृत” की भी घोषणा की। इसमें 2030 तक गैर जीवाश्म ईंधन आधरित उर्जा क्षमता को बढ़ाना, आधी उर्जा जरूरतों को अक्षय ऊर्जा स्रोतों से पूरा करना। एक अरब टन कार्बन उत्सर्जन घटाना और 2030 तक रेलवे को नेट जीरो उत्सर्जक बनाने जैसी प्रतिबद्धता शामिल की है।

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