सर्वश्रेष्ठ भारत के लक्ष्य को सुगम बनाएगी हमारी गौरवमयी मातृभाषा

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भारत विविधताओं का देश है। अनेक भाषाओं और बोलियों से सजी यह गौरव धरा लोगों को एकता के सूत्र में जोड़ती है। महान स्वतंत्रता सेनानी आचार्य केशवचन्द्र सेन ने साल 1875 में अपने समाचार पत्र सुलभ समाचार में लिखा था कि अपनी बात को इस देश में आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाने में सबसे सरलतम मार्ग है हिंदी। इसका अर्थ है कि हिंदी भारतीय जनमानस की आत्मा में बसती है। कवि गुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी एक बार कहा था कि भारत की सब प्रांतीय बोलियां अपने घर में रानी बन कर रहें और आधुनिक भाषाओं के हार की मध्यमणि हिंदी भारत-भारती होकर विराजती रहें। उनके कहे इन शब्दों की ताकत का नतीजा आधुनिक भारत में दिख रहा है। भारत सरकार ने इस दिशा में कारगर कदम उठाएं है। अब जरूरत है हिंदी के स्वरूप को दुनिया के सामने लाकर विश्व भाषा के तौर पर दर्जा देने की।

क्षेत्रीय भाषाओं से मिलेगी हिंदी को प्रबलता

हिंदी में ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी, पहाड़ी, बुंदेली, मागधी, बघेली और खड़ी भाषाओं के साथ ही उन उपजन भाषाओं के शब्द भंडार, लोकोक्तियां और मुहावरे रची बसी हुई है। हिंदी का इन सभी क्षेत्रीय भाषाओं के साथ शताब्दियों से गहरा संबंध रहा है। भाषा में विश्व मन का भाव होने से ही विश्व भाषा के तौर पर हिंदी को स्थापित कर सकेंगे। हिंदी साहित्य की विशालता किसी भी देश के साहित्य प्रेमियों के लिए अनमोल रत्न रूपी खजाना है, जो विश्व के पाठकों और साहित्य के लब्धियों को अपनी और आकर्षित कर पाने में समर्थ है। विश्व भाषा से यह अपेक्षा रखी जाती है कि उसे बोलने और समझने वालों को एक लक्षित क्षेत्र के भौगोलिक विस्तार और अभिव्यक्ति की समझ को परिलक्षित कर सके। हिंदी एकमात्र ऐसी भाषा है जो एक स्वीकृत मानक के आधार पर बनी हुई है। हिंदी का यह विशेष गुण उसे सर्वाधिक प्रिय बनाता है। एनाकाटीर इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार चीनी भाषा के बाद दुनिया में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली भाषा हमारी हिंदी भाषा है।

जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक है हिंदी

सहज, सरल और सुगम होने के साथ ही हिंदी भाषा हमारे भारतीय जीवन मूल्यों, संस्कृति और संस्कारों की सच्ची संवाहक है। एक भाषा के रूप में यह हमारी संवेदनशील परिचायक है।1918 में पहली बार जब हिंदी साहित्य सम्मेलन में महात्मा गांधी ने इसे राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही शायद तभी से हिंदी अपने गौरवशाली अतीत को पुकार रही है। हिंदी को सिरमौर बनाने के लिए जरूरी है कि हमें इसे भाषा नहीं अपितु परिवार के एक अभिन्न अंग के तौर पर स्वीकार करना होगा। जरूरत है इस भावनात्मक भाषा को जनमानस तक पहुंचाने की, ताकि मर्यादित भाषा की सौंदर्यता सभी तक पहुंच सके। नए युग में हमने हिंदी को हिंग्लिश में बदल दिया है, जो हिंदी के जीवंत स्वरूप पर कुठाराघात करने जैसा है, अब जरूरत है हमें संप्रेषण के लिए देशज भाषाओं का इस्तेमाल करना होगा, ताकि हम हिंदी को उसका पुरातन गौरव वापस दिला सकता है।

आप ये लेख दी बावाबिलाट की वेबसाइट पर पढ़ रहे थे। इस लेख की लेखिका एकता शर्मा जो स्वतंत्र लेखिका और समीक्षक

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